थप्पड़ की गूंज कितनी गहरी होती है इससे आम इंसान अच्छी तरह वाकिफ है, क्योंकि मंहगाई के नाम पर आये दिन मिलने वाले आश्वासन किसी थप्पड़ से कम नहीं हैं…लेकिन एक माननीय मंत्री को अस्ल में थप्पड़ क्या लगा, सभी नेता दलगत भावना से ऊपर उठकर इस गूंज को महसूस करने लगे…हमारे निर्वाचित नेताओं ने तो इसे लोकतंत्र पर हमला मान लिया…लेकिन इस थप्पड़ के लिए किसने मजबूर किया ये बताने वाला कोई नेता आगे नहीं आया…या फिर किसी नेता में इतना दम नहीं था…खैर जो भी हो उस दिन ऐसा लग रहा था कि जैसे एक नेता का स्वर दूसरे नेता के स्वर से हूबहू मेल खा रहा हो…दिखने में भले नेताओं में जोश हो, लेकिन शब्दों का चयन ऐसा था कि वो किसी को श्रद्धांजली दे रहे हों…इस दौरान सभी नेता दुहाई देने लगे कि उनको किसानों ने, मजदूरों ने, आम लोगों ने चुन कर भेजा है इसलिए उनको कैसे कोई थप्पड़ मार सकता है…आम लोगों के समर्थन का गुमान भरने वाले और देश को चलाने वाले एक मंत्री ने अपनी कार्यशैली पर नहीं बल्कि लोगों पर ही उंगली उठा दी…उनका कहना था कि ”पता नहीं देश कहां जा रहा है”…अब इन नेताओं से पूछा जाना चाहिए कि वो तब कौन सी संसदीय परंपरा निभाते हैं जब किसानों को अपनी मेहनत से पैदा किए गेहूं के सही दाम पाने के लिए या कर्जे में राहत लेने के लिए…सड़क पर आना पड़ता है…पुलिस की गोली लाठी खानी पड़ती है…तब कोई नेता इसे लोकतंत्र पर हमला क्यों नहीं बताता…उसके खिलाफ वाकई में आवाज या आंदोलन क्यों नहीं करता….केंद्र या कोई राज्य सरकार तब क्यों आंखें मूंद लेती है क्यों वो सिर्फ मुआवजा देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी समझ लेती है…और विपक्ष सिर्फ विरोध के लिए विरोध क्यों करता रह जाता है…क्या नेता को लगा थप्पड़ और किसान को लगी गोली में कोई फर्क नहीं है…हां फर्क है….गोली से किसान की जान जाती है और नेता की थप्पड़ से इज्जत…और नेताओं की नजर में जान से ज्यादा कीमत इज्जत की होती है…तभी तो 9 दिन संसद भले ना चली हो…लेकिन हमारे माननीयों ने थप्पड़ पर चर्चा करने का वक्त इसमें से भी निकाल लिया…और जनता से जुड़े विधेयक और अहम् मुद्दे लटके रह गए…जिनकी अहमियत नेताओं की नजर में थप्पड़ से कम थी…
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